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फेडरल रिजर्व ब्याज दर स्थिर: 3.75 से 4% पर कायम, भारत पर क्या होगा असर

अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर 3.75 से 4 प्रतिशत पर स्थिर रखी। महंगाई 3.7% पर है, जानिए भारतीय बाज़ार और रुपये पर क्या असर हो सकता है।

सांकेतिक तस्वीर: अमेरिकी डॉलर के नोट
सांकेतिक तस्वीर: अमेरिकी डॉलर के नोट  फ़ोटो: adrian vieriu / Pexels

फेडरल रिजर्व ब्याज दर को लेकर अमेरिका के केंद्रीय बैंक ने बुधवार, 28 अक्टूबर को कोई बदलाव नहीं किया। वाशिंगटन में दो दिन चली बैठक के बाद प्रमुख दर 3.75 से 4 प्रतिशत के दायरे में कायम रखी गई। यह फैसला भारत समेत दुनिया भर के शेयर बाज़ारों और मुद्राओं के लिए अहम माना जाता है।

मुख्य बातें

  • फेड ने प्रमुख ब्याज दर 3.75 से 4 प्रतिशत पर स्थिर रखी।
  • फैसला 10-2 से हुआ, दो सदस्य 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी चाहते थे।
  • सितंबर में अमेरिका की सालाना उपभोक्ता महंगाई 3.7 प्रतिशत रही, जबकि लक्ष्य 2 प्रतिशत है।
  • बाज़ार अब दिसंबर के फैसले पर नज़र रखे हुए है।

इंडिया टीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, फेड ने अपने बयान में कहा कि महंगाई अभी भी ऊंची है। दरें स्थिर रखने से अधिकारियों को आगे का कदम तय करने से पहले आर्थिक आंकड़ों की समीक्षा का समय मिलेगा।

फेड ने सितंबर में प्रमुख दर 0.25 प्रतिशत बढ़ाई थी। इस बार फैसले के बाद फेड चेयर केविन वॉर्श ने पत्रकारों से बात की।

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सांकेतिक तस्वीर: बाज़ार के उतार-चढ़ाव का ग्राफ
सांकेतिक तस्वीर: बाज़ार के उतार-चढ़ाव का ग्राफ फ़ोटो: RDNE Stock project / Pexels

फेडरल रिजर्व ब्याज दर पर क्या फैसला हुआ?

फेड की मौद्रिक नीति समिति (FOMC) ने दर में कोई बदलाव नहीं किया। समिति के 10 सदस्यों ने दर स्थिर रखने का समर्थन किया, जबकि 2 सदस्य 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी के पक्ष में थे। फेड ने यह संकेत भी दिया कि आने वाले महीनों में और बढ़ोतरी संभव है।

बिंदु आंकड़ा
प्रमुख ब्याज दर 3.75 से 4 प्रतिशत (स्थिर)
वोटिंग 10-2
सितंबर में महंगाई 3.7 प्रतिशत
महंगाई लक्ष्य 2 प्रतिशत
बेरोज़गारी दर 4.2 प्रतिशत

अमेरिका में महंगाई कितनी है?

अमेरिका में सितंबर में उपभोक्ता महंगाई सालाना आधार पर 3.7 प्रतिशत रही, जो फेड के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से काफ़ी ऊपर है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऊंची ऊर्जा कीमतें और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च इसकी बड़ी वजहें हैं। अगस्त और सितंबर दोनों महीनों में कीमतें मासिक आधार पर 0.3 प्रतिशत बढ़ीं।

अमेरिका में 30 साल के होम लोन की दर इस महीने की शुरुआत में 7.4 प्रतिशत तक पहुंची, जो तीन साल का सबसे ऊंचा स्तर था। इसके बाद इसमें थोड़ी नरमी आई।

भारत पर क्या होगा असर?

अमेरिका में ऊंची दरें उभरते बाज़ारों में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी कम कर सकती हैं, हालांकि यह तय नहीं है। आज समाज के विश्लेषण के अनुसार, मज़बूत डॉलर और विदेशी पूंजी की निकासी से रुपये पर दबाव आ सकता है। रुपये की चाल व्यापार घाटे, विदेशी मुद्रा भंडार, कच्चे तेल की कीमत और आरबीआई के कदमों पर भी निर्भर करती है।

ब्रेंट क्रूड बुधवार को करीब 115 डॉलर प्रति बैरल पर था। तेल लंबे समय तक महंगा रहा तो भारत का आयात बिल और घरेलू महंगाई दोनों बढ़ सकते हैं। आरबीआई पर असर अप्रत्यक्ष है, क्योंकि केंद्रीय बैंक घरेलू हालात देखकर फैसला करता है। हाल की आईएमएफ रिपोर्ट में भारत की विकास दर का अनुमान भी इस तस्वीर को समझने में मदद करता है।

आगे क्या होगा?

फ्यूचर्स बाज़ार संकेत दे रहे हैं कि निवेशक दिसंबर में बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि फेड ने कोई तय समयसीमा नहीं बताई है और अगला कदम आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेगा।

आपके लिए इसका क्या मतलब है

अगर आप शेयर बाज़ार में निवेश करते हैं, तो अगले कुछ हफ़्तों में विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री, रुपये की चाल और कच्चे तेल की कीमत पर नज़र रखें। विदेश में पढ़ाई या यात्रा की योजना है तो डॉलर की दर पर ध्यान देना उपयोगी होगा। दुनिया की अन्य बड़ी घटनाओं जैसे मॉस्को में रूस-अफ्रीका शिखर सम्मेलन के लिए हमारा दुनिया सेक्शन देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

फेडरल रिजर्व की ब्याज दर अभी कितनी है?

28 अक्टूबर 2026 के फैसले के बाद फेड की प्रमुख ब्याज दर 3.75 से 4 प्रतिशत के दायरे में है। सितंबर में इसे 0.25 प्रतिशत बढ़ाया गया था और इस बार इसे स्थिर रखा गया।

फेड ने ब्याज दर क्यों नहीं बदली?

फेड के मुताबिक महंगाई अभी भी ऊंची है। दर स्थिर रखने से अधिकारियों को आगे का फैसला लेने से पहले नए आर्थिक आंकड़ों की समीक्षा का समय मिलता है। आगे बढ़ोतरी का विकल्प खुला रखा गया है।

क्या फेड के फैसले से रुपया कमज़ोर होगा?

मज़बूत डॉलर और विदेशी पूंजी की निकासी से रुपये पर दबाव आ सकता है, लेकिन यह तय नहीं है। रुपये की चाल व्यापार घाटे, विदेशी मुद्रा भंडार, कच्चे तेल और आरबीआई के कदमों पर भी निर्भर करती है।

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Akshay

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